रविवार को पीपल के वृक्ष की पूजा करने से आती है दरिद्रता, जानिए क्यों

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हिंदू धर्मग्रंथों में लिखा गया है कि ‘हरि अनंत, हरि कथा अनंता’। इस बात के जरिए कण-कण में बसे ईश्वर के स्वरूप व शक्तियों की ही महिमा उजागर की गई है। इसी धर्म आस्था को बल देती है – पीपल पूजा। हिन्दू धर्म में पीपल को देव वृक्ष माना जाता है

श्रीमद्भगवद्गीता में भी भगवान कृष्ण ने पीपल को स्वयं का स्वरूप बताया है। इसे ‘अश्वत्थ’ कहकर पुकारा गया है। यही कारण है कि देवमूर्ति की पूजा या मंदिर न जाने की दशा में पीपल पूजा ही दरिद्रता दूर कर सुख, ऐश्वर्य व धन की कामना को पूरी करने वाली मानी गई है। लेकिन क्या आप जानते है कि रविवार के दिन पीपल के वृ7 की पूजा नही की जाती है। इसके बारें में एक कथा हमारें ग्रंथों में दी गई है।
शास्त्रों के अनुसार माना जाता है कि रविवार के दिन पीपल की पूजा करने से घर में द्रदिदता का वास हो जाता है। जिससे आप चाहे जितना भी मेहनत करें, लेकिन आपको हमेसा असफलता ही प्राप्त होगी। जानिए रविवार के दिन पीपल के वृक्ष की पूजा न करने का क्या कारण है।
जिन लोगों का भाग्य साथ नहीं देता उन्हें पीपल में प्रतिदिन जल चढ़ाकर, सात परिक्रमा करनी चाहिए। इससे कुछ ही दिनों में व्यक्ति को भाग्य का साथ अवश्य मिलने लगेगा।

रात में पीपल की पूजा को निषिद्ध माना गया है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि रात्री में पीपल पर दरिद्रा बसती है और सूर्योदय के बाद पीपल पर लक्ष्मी का वास माना गया है।
इस कथा के अनुसार मां लक्ष्मी और उनकी छोटी बहन दरिद्रा श्री विष्णु के पास गई और उनसे बोली कि जगत के पालनहार कृपया हमें रहने का स्थान दें। इस बात पर विष्णु बोले कि आप दोनों लोग पीपल के वृक्ष पर निवास करों। इस तरह दोनों बहने उस वृक्ष में निवास करने लगी। इसी साथ पीपल ने भगवन विष्णु से यह वरदान प्राप्त कर दिया कि जो शनिवार के दिन मेरी पूजा करेगा। उसके ऊपर लक्ष्मी हमेशा खुश रहेगी और उनकी कृपा उसपर हमेशा बना रहेगी। इसी तरह रविवार को पूजा न करने के पीछे का कारण है।
एक बार विष्णु भगवान ने माता लक्ष्मी से विवाह करना चाहा तो लक्ष्मी माता ने इंकार कर दिया क्योंकि उनकी बड़ी बहन दरिद्रा का विवाह नहीं हुआ था। उनके विवाह के बाद ही वह श्री विष्णु से विवाह कर सकती थी। इसलिए माता लक्ष्मी ने अपनी बहन दरिद्रा से पूछा कि वो कैसा वर पाना चाहती हैं। तो वह बोली कि वह ऐसा पति चाहती हैं जो कभी पूजा-पाठ न करे व उसे ऐसे स्थान पर रखे जहां कोई भी पूजा-पाठ न करता हो।
इसी प्रकार भगवान विष्णु ने उनके लिए ऋषि नामक वर चुना और दोनों विवाह सूत्र में बंध गए। अब दरिद्रा की शर्त के अनुसार ही उन दोनों को ऐसे स्थान पर वास करना था जहां कोई भी धर्म कार्य न होता हो। ऋषि उसके लिए उसका मन भावन स्थान ढूंढने निकल पड़े लेकिन उन्हें कहीं पर भी ऐसा स्थान न मिला। अधिक समय बीत जाने के बाद ऋषि के वापस न आने पर दरिद्रा उनके इंतजार में विलाप करने लगी।
इसी क्रम में भगवान विष्णु ने दुबारा लक्ष्मी के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा तो लक्ष्मी जी बोलीक कि जब तक मेरी बहन की गृहस्थी नहीं बसती मैं विवाह नहीं करूंगी। इस बात पर भगवान विष्णु को समझ नही आया कि ऐसा कौन सी जगह ढूढे जहां पर कोई धर्म न हो। धरती पर ऐसा कोई स्थान नहीं है। जहां कोई धर्म कार्य न होता हो। इसलिए भगवान विष्णु ने अपने निवास स्थान पीपल को रविवार के लिए दरिद्रा और उसके पति को दे दिया। इसीकारण हर रविवार पीपल के नीचे देवताओं का वास न होकर दरिद्रा का वास होता है। इसी कारण इस दिन पीपल की पूजा वर्जित मानी जाती है।

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