जैन धर्म : रोटतीज व्रत पूजन विधि

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 कैसे करें श्री चौवीसी रोटतीज व्रत पूजा
स्थापना
व्रत चौवीसी महा शुद्ध मन वच करो।
सकल पाप क्षय जाय कर्म निर्झर करो।।
भाषी श्री मुनिरायं कर्म क्षय कारने।
लक्ष्मी स्‍थिर हो जाये भव्य जग तारने
ॐ ह्रीं श्री क्लीं चौबीसी व्रत! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वानम्।
ॐ ह्रीं श्री क्लीं चौबीसी व्रत! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्‍थापनं।
ॐ ह्रीं श्री क्लीं चौबीसी व्रत! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्नि‍धिकरणं। पुष्पांजलि क्षिपेत।
जल मन मोहन ले आय कंचन के कलशा।
त्रय लोक तीज व्रत सार ज्ञाना‍व‍रणि नशा।।
चौबीसी व्रत है सार की जो नर नारी।
संकट को होय विनाश व्रत महिमा भारी।।
ॐ ह्रीं श्री क्लीं चौबीसी व्रताय जन्म जरा मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
चन्दन कपूर मिलाय केशर घसि लायो।
दर्शनावरणी कर नाश तुम शरणै आयो।।
चौबीसी व्रत है सार की जो नर नारी।
संकट को होय विनाश व्रत महिमा भारी।।
ॐ ह्रीं श्री क्लीं चौबीसी व्रताय भव ताप विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
अक्षत मोती सम ले लायो भर थारी।
होय कर्म वेदनी नाश अक्षय पद धारी।।
चौबीसी व्रत है सार की जो नर नारी।
संकट को होय विनाश व्रत महिमा भारी।।
ॐ ह्रीं श्री क्लीं चौबीसी व्रताय अक्षय पद प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
व्रत ब्रह्मचर्य शुभ सार नाशक काम महा।
होय कर्म मोहनी नाश पूजौं पुष्प यहां।।
चौबीसी व्रत है सार की जो नर नारी।
संकट को होय विनाश व्रत महिमा भारी।।
ॐ ह्रीं श्री क्लीं चौबीसी व्रताय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
नाना विधि ले पकवान व्यंजन त्यार करूं।
होय आयु कर्म का नाश तुमरे चरन परूं।।
चौबीसी व्रत है सार की जो नर नारी।
संकट को होय विनाश व्रत महिमा भारी।।
ॐ ह्रीं श्री क्लीं चौबीसी व्रताय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
मैं दीप रतन मय लेय तम नाशन आयो।
मम नाम कर्म विनाशाय मैं बहु दुख पायो।।
चौबीसी व्रत है सार की जो नर नारी।
संकट को होय विनाश व्रत महिमा भारी।।
ॐ ह्रीं श्री क्लीं चौबीसी व्रताय महामोहांधकार विनाशनाय दीपं नैवद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
मैं धूप दशांग बनाय लायो तुम चरना।
है अष्ट करम अति दुष्ट ताको तुम हरना।।
चौबीसी व्रत है सार की जो नर नारी।
संकट को होय विनाश व्रत महिमा भारी।।
ॐ ह्रीं श्री क्लीं चौबीसी व्रताय अष्टकर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
यह फल वह फल है नांहि जो तुम है वरना।
दुष्ट अन्तराय का नाश बेगहि है करना।।
चौबीसी व्रत है सार की जो नर नारी।
संकट को होय विनाश व्रत महिमा भारी।।
ॐ ह्रीं श्री क्लीं चौबीसी व्रताय महामोक्ष फल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
जल फल वसु द्रव्य मिलाय तुम सम्मुख धारी।
कर‍ि मोह अरी का नाश तुम पद बलिहारी।।
चौबीसी व्रत है सार की जो नर नारी।
संकट को होय विनाश व्रत महिमा भारी।।
ॐ ह्रीं श्री क्लीं चौबीसी व्रताय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
। पद्धरि छंद जयमाला ।।
इक समय श्री वर्धमान राय, विपुलाचल पर ठाडे जु आय।
मगधेश नृपति श्रेणिक सुराय, सिरनाय सभा मधि बैठ‍ि जाय।।
तब राय कहे कर जोड़ हाथ, चौबीसी व्रत मोहे कहो नाथ।
किन कीनों किन फल लह्यो सार, हे नाथ व्रत भाषो जु सार।।
तब गौतम स्वामी कहे विचार, सुन राय त्रितिया व्रत कहूं सार।
व्रत करिया करम क्लेश जाय, भवि जीव लहै आनन्द पाय।।
अतिचार रहित व्रत पाल सार, त्रयकाल जाप करना विचार।
नगर उज्जैनी मांहि सागर दत्त के यहां।
दमयंती घर नार सार शोभैं जहां।।
एक दिवस सेठानी मुनि से यूं कही।
कोई व्रत द्यो नाथ सुगम होवे सही।।
एक साल में एक बार आवे सही।
जन्म सुफल हो जाय नाथ अर्जी यही।।1।।
भादव सुदी को तीज व्रत मन में धरो।
करि सब रस का त्याग एकाशन आदरो।।
सामायिक अरू जाप्य शांत मन में धरो।
निरतिचार व्रत पाल ‍चित संशय रहो।।2।।
चौबीसी व्रत सब गुरुवर से ले लियो।
सेठानी घर जाय हाल सारो कह्यो।।
सुनत हाल परिवार व्रत निंदा करो।
पाप भार की गठरी सिर ऊपर धरी।।3।।
छप्पन क्रोड दीनार लक्ष्मी थी जहां।
व्रत निंदा के पाप नाश तामें लहा।।
दुखिया हो सेठानी सबने यूं कहै।
देशांतर को चालो अब दुख न सहै।।4।।
सुत सातों होय साथ भार्या संग में।
सोलह दुखिया निसरे आय तरंग में।।
हस्तनागपुर पुत्री परनी थी जहां।
सबको ले माता गयी थी तब ही वहां।।5।।
पुत्री ने कही बात यहां रहना नहीं।
होऊं मैं बदनाम सार समझो यही।।
चोर-चोर धन पीहर ले जावे सही।।
मुझसे तो यह बात सहन होगी नहीं।।6।।
नगर बसंतपुर मांहि सासरे आ गये।
सेठ रामजी घर को वो पूछत गये।
तब वे जानी बात आज जीमन सही।
फाटे कापड़े जावें लज्जा रहे नहीं।।7।।
मॉड लेन दमयंती पिछवाड़े गयी।
मोरी नीचे जाय के हांडी धर दई।।
पत्थर सरका दियो भोजाई ने वहां।
हाथ-पांव जल गये मांड‍ बिखरे तहां।।8।।
झोली मांही डाल मांड सुत ले गये।
अशुभ करम के उदय दु:ख सहते गये।।
नगर अयोध्या मांहि सागरदत्त मित्र है।
दुख काटन के हेतु मित्र धर जात है।।9।।
दुख में कीजो सहाय मित्र यह बात है।
मित्र कहे मैं चाकर क्यूं घबड़ात है।।
दुख-सुख करता बात रात आधी गयी।
मढी मोरनी हार जु निगलत है भई।।10।।
बात विचारे सेठ अबै चौरी लगे।
हो ‍दुखियारो सेठ तबै वहां से भगै।।
चंपापुर के मांहि समुद्रदत्त सेठ है।
करत नौकरी भरत वहां पर पेट है।।11।।
खाने को जौ दो सेर ले लेत है।
दो पैसे भर कड़वा तेल भी लेत है।।
भादव सुदि की दूज सेठानी यूं कही।
सकल स्वच्छता रखो व्रत आयो सही।।12।।
छोटी बहू ने पूछा कैसा व्रत है।
लक्ष्मी स्थिर हो जाये करम क्षय होत है।।
अपने भाग्य का रोट लेय मंदिर गई।
करूणिक वचन उचार स्तुति करती गई।।13।।
समुद्रद्दत्त सेठानी रोट इक तब दियो।
दमयंती कर आय रोट सोना भयो।।
मंदिर में जो रोट चढ़ाया था सही।
रत्नों का बन गया बात सारे भई।।14।।
चंपापुर ते चाल अयोध्या आ गये।
देखत ही तब आय मित्र भेटत भये।।
दुख-सुख करते बात रात आधी गई।
मढ़ी मोरनी हार तबै उगलत भई।।15।।
तहां ते चलकर नगर बसंतपुर आ गये।
सेठ रामजी लेने को पहुंचत भये।।16।।
दमयंती कहेधन देखन भाई आ गये।
मेरे अंग अंग अच्छे अब तक नहीं भये।
कहे रामजी सेठ बहन सुनजो सही।
कर्म उदय जब आवे तैसी हो सही।।17।।
कर्म उदयगति कुबुद्धि सेठानी को भई।
क्या कमती द्यर मांहि बहन घर ना रही।।
कर्म उदय की बात चित्त मन मत धरो।
होनहार हो गया बात अब जु बिसरो।।18।।
हस्तनागपुर आवत तब ठहरत भये।
बेटी को दी खबर आज हम आ गये।।
सखियन को लेय संग कलश लावत भई।
सुख-दु:ख की सब बात करत वे ही भई।।19।।
भोजाई कहे बात ननद सुनज्यो सही।
ता दिन की वह बात चित्त विसरत नहीं।।
एक दिवस रहने को जगह तुम ना दई।
धरा ठीकरा यही गडा भूमि मही।।20।।
ननद कहे भोजाई कर्म गति चित धरो।
होनहार बलवान सबर मन में करो।।
तहं ते चलकर नगर उज्जैनी आ गये।
सब ही धन वहां पर वापिस आ गयो।।21।।
बिछुरे दास मिले आकर सबै।
व्रत निंदा गति सोची मन विसरौ अबै।।
जो यह करसी व्रत स्वर्ग सुख पावसी।
कर्म काट निर्वाण अंत गति जावसी।।22।।
ॐ ह्रीं श्री क्लीं चौबीसी व्रताय अनर्घपद प्राप्तये जयमाला पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

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