समझौता करने का मुहुर्त

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समझौता करने का मुहुर्त | Samjhaute ka Muhurat

 

पुरानी कहावत है कि लकड़ी को जितना काटा जाता है वह उतना ही पतली होती जाती है और बातों को जितना काटा जाय वह उतना ही मोटा होता जाता है। इस कहावत का तात्पर्य है कि जीवन में लड़ाई झगड़े से कुछ भी हासिल नहीं होता है जितना ही हम बातों को बढ़ाएंगे हमारा मनमुटाव उतना ही बढ़ता जाएगा। मनमुटाव व संधर्ष को समाप्त करने का सबसे आसान तरीका है समझौता करना।

 

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ज्योतिषशास्त्री कहते हैं कि समझौता करने से पहले मुहुर्त का विचार अवश्य ही करना चाहिए। मुहुर्त का विचार करके अगर हम समझौता करते है तो समझौता दोनों पक्षों में परस्पर मित्रता को बढ़ाता है व उसे लम्बे समय तक कायम भी रहता है इसलिए समझौता करने से पहले हमको शुभ मुहुर्त का आंकलन अवश्य कर लेना चाहिए ।

समझौता के लिए रिक्ता तिथियों यानी चतुर्थी, नवमी एवं चतुदर्शी और इसके अतिरिक्त अमावस्या का त्याग करने में ही बुद्धिमानी है । जहाँ तक सम्भव हो समझौता सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच अर्थात दिन में सूर्य देव कि रौशनी में ही करना चाहिए, रात्रि में नहीं और समझौता हो जाने के बाद दोनों पक्षों को एक दूसरे का मुँह अवश्य ही मीठा कराना चाहिए ।
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सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार और शुक्रवार समझौता करने के लिए शुभ दिन माने गये हैं । जिस दिन आप समझौता करने जा रहे हैं उस दिन इन चारों वारों में से कोई भी वार हो यह जरूर देख लें, इससे समझौता के सफल होने कि सम्भावना बड़ जाती है ।

रविवार, मंगलवार एवं शनिवार इन तीन दिन में समझौता एवं संधि नहीं करनी चाहिए।
दिन, तिथि व नक्षत्र का योग भी जिस दिन 13 आए उस दिन भी समझौता या कोई मांगलिक आयोजन नहीं करना चाहिए।

समझौता करने के लिए जब भी आप पहल करें तब नक्षत्र, वार का विचार करने के पश्चात तिथि का भी आंकलन करना चाहिए।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार समझौता के लिए अष्टमी और द्वादशी तिथि बहुत ही शुभ होती है अत: इस तिथि के रहते ही समझौता करना चाहिए।

इसका अर्थ यह है की सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार और शुक्रवार को यदि अष्टमी और द्वादशी तिथि पड़े तो यह समझौता के लिए बहुत ही शुभ माना गया है ।

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